जुगनू
(बीस बरस के उस नौजवान के जज्बात,जिसकी माँ उसी दिन मर गयी जिस दिन वह पैदा हुआ)
ये मस्त-मस्त घटा ये भरी-भरी बरसात
तमाम हद्दे-नजर तक घुलावटों का समाँ!
फ़जा-ए-शाम में डोरे-से पड़ते जाते हैं
जिधर निगाह करें कुछ धुआँ सा उठता है
दहक उठा है तरावट की आँच से आकाश
जे-फ़र्श-ता-फ़लक अँगड़ाइयों का आलम है
ये मद भरी हुई पुर्वाइयाँ सनकती [...]
Archive for December, 2008
जुगनू – रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी
Posted in कविता on December 25, 2008 | 2 Comments »