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	<title>समर्पित</title>
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	<description>बीते हुये कल को !!!</description>
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		<title>समर्पित</title>
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		<title>जुगनू &#8211; रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Dec 2008 19:59:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रजनीश त्रिपाठी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[
जुगनू
(बीस बरस के उस नौजवान के जज्बात,जिसकी माँ उसी दिन मर गयी जिस दिन वह पैदा हुआ)
ये मस्त-मस्त घटा ये भरी-भरी बरसात
तमाम हद्दे-नजर तक घुलावटों का समाँ!
फ़जा-ए-शाम में डोरे-से पड़ते जाते हैं
जिधर निगाह करें कुछ धुआँ सा उठता है
दहक उठा है तरावट की आँच से आकाश
जे-फ़र्श-ता-फ़लक अँगड़ाइयों का आलम है
ये मद भरी हुई पुर्वाइयाँ सनकती [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=trajaneesh.wordpress.com&blog=849923&post=11&subd=trajaneesh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><img src="http://trajaneesh.files.wordpress.com/2008/12/firak.jpg?w=316&#038;h=500" alt="firak" title="firak" width="316" height="500" class="aligncentre size-full wp-image-14" /><br />
<blockquote><strong>जुगनू<br />
(बीस बरस के उस नौजवान के जज्बात,जिसकी माँ उसी दिन मर गयी जिस दिन वह पैदा हुआ)</strong></p>
<p>ये मस्त-मस्त घटा ये भरी-भरी बरसात<br />
तमाम हद्दे-नजर तक घुलावटों का समाँ!<br />
फ़जा-ए-शाम में डोरे-से पड़ते जाते हैं<br />
जिधर निगाह करें कुछ धुआँ सा उठता है<br />
दहक उठा है तरावट की आँच से आकाश<br />
जे-फ़र्श-ता-फ़लक अँगड़ाइयों का आलम है<br />
ये मद भरी हुई पुर्वाइयाँ सनकती हुई<br />
झिंझोड़ती है हरी डालियों को सर्द हवा<br />
ये शाख़सार के झूलों में पेंग पड़ते हुये<br />
ये लाखों पत्तियों का नाचना ये रक्से-नबात( वनस्पतियों का नाच)<br />
ये बेख़ुदी-ए-मसर्रत ये वालहाना रक्स<br />
ये ताल-सम ये छमाछम-कि कान बजते हैं<br />
हवा के दोश प कुछ ऊदी-ऊदी शक्लों की<br />
नशे में चूर-सी परछाइयाँ थिरकती हुई<br />
उफ़ुक़ प डूबते दिन की झपकती हैं आखें<br />
ख़मोश सोजे़-दरूँ(हृदय की जलन) से सुलग रही है ये शाम!</p>
<p>मेरे मकान के आगे है एक सह्‌ने-वसीअ(विशाल दालान)<br />
कभी वो हँसती नजर आती कभी वो उदास<br />
उसी के बीच में है एक पेड़ पीपल का<br />
सुना है मैंने बुजु़र्गों से ये कि उम्र इसकी<br />
जो कुछ न होगी तो होगी कोई छियानवे साल<br />
छिड़ी थी हिन्द में जब पहली जंगे-आजादी<br />
जिसे दबाने के बाद उसको ग़द्‌र कहने लगे<br />
ये अह्‌ले हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूम!<br />
वो दारो-गीर वो आजा़दी-ए-वतन की जंग<br />
वतन से थी कि ग़नीमे-वतन (देश के दुश्मन)से ग़द्दारी<br />
बिफर गये थे हमारे वतन के पीरो-जवाँ(बूढ़े-जवान)<br />
दयारे-हिन्द में रन पड़ गया चार तरफ़<br />
उसी ज़माने में ,कहते हैं,मेरे दादा ने<br />
जब अरजे़-हिन्द सिंची ख़ून से ‘सपूतों’ के<br />
मियाने-सह्‌न लगाया था ला के इक पौदा<br />
जो आबो-आतशो-ख़ाको-हवा से पलता हुआ<br />
ख़ुद अपने क़द से बजोशे-नुमूँ निकलता हुआ<br />
फ़ुसूने-रूहे-नबाती रगों में चलता हुआ<br />
निगाहे-शौक़ के साँचों में रोज़ ढलता हुआ</p>
<p>सुना है रावियों से दीदनी(देखने योग्य) थी उसकी उठान<br />
हर-इक के देखते ही देखते चढ़ा पर्वान<br />
वही है आज ये छतनार पेड़ पीपल का<br />
वही है आज ये छतनार पेड़ पीपल का<br />
वो टहनियों के कमण्डल लिये,जटाधारी<br />
ज़माना देखे हुये है ये पेड़ बचपन से<br />
रही है इसके लिये दाख़िली कशिश मुझमें<br />
रहा हूँ देखता चुपचाप देर तक उसको<br />
मैं खो गया हूँ कई बार इस नजारे में<br />
वो उसकी गहरी जड़ें थीं कि जिन्दगी की जड़ें<br />
पसे-सुकूने-शजर कोई दिल धड़कता था<br />
मैं देखता था कभी इसमें जिन्दगी का उभार<br />
मैं देखता था उसे हस्ती-ए-बशर की तरह<br />
कभी उदास,कभी शादमा,कभी गम्भीर!</p>
<p>फ़जा का सुरमई रंग और हो चला गहरा<br />
धुला-धुला-सा फ़लक है धुआँ-धुआँ-सी है शाम<br />
है झुटपुटा की कोई अज़दहा है मायले-ख्वाब<br />
सुकूते-शाम में दरमान्दगी(थकन) का का आलम है<br />
रुकी-रुकी सी किसी सोच में है मौजे़-सबा<br />
रुकी-रुकी सी सफ़ें मलगजी घटाओं की<br />
उतार पर है सरे-सह्‌न रक्स पीपल का<br />
वो कुछ नहीं है अब इक जुंबिशे-ख़फी के सिवा<br />
ख़ुद अपनी कैफ़ियत-नीलगूँ में हर लह्‌जा<br />
ये शाम डूबती जाती है छिपती जाती है<br />
हिजाबे-वक्‍़त सिरे से है बेहिसो-हरकत<br />
रुकी-रुकी दिले-फ़ितरत की धड़कनें यकलख्‍़त<br />
ये रंगे-शाम कि गर्दिश हो आसमाँ में नहीं<br />
बस एक वक्‍़फ़ा-ए-तारीक,लम्हा-ए-शह्‌ला<br />
समा में जुंबिशे-मुबहम-सी कुछ हुई ,फौ़रन<br />
तुली घटा के तले भीगे-भीगे पत्तों से<br />
हरी-हरी कई चिंगारियाँ-सी फूट पड़ीं<br />
कि जैसे खुलती-झपकती हों बेशुमार आँखें<br />
अजब ये आँख-मिचौली थी नूरो-जु़लमत (अँधेरा-रोशनी)की<br />
सुहानी नर्म लवें देते अनगिनत जुगनू<br />
घनी सियाह खु़नक पत्तियों के झुरमुट से<br />
मिसाले-चादरे-शबताब जगमगाने लगे<br />
कि थरथराते हुए आँसुओं से साग़रे-शाम<br />
छलक-छलक पड़े जैसे बग़ैर सान-गुमान<br />
बतूने-शाम में इन जिन्दा क़ुमक़ुमों की चमक<br />
किसी की सोयी हुई याद को जगाती थी-<br />
वो बेपनाह घटा वो भरी-भरी बरसात<br />
वो सीन देख के आँखें मेरी भर आती थीं<br />
मेरी हयात ने देखीं हैं बीस बरसातें<br />
मेरे जनम ही के दिन मर गयी थी माँ मेरी<br />
वो माँ कि शक्ल भी जिस माँ कि मैं न देख सका<br />
जो आँख भर के मुझे देख भी सकी न ,वो माँ<br />
मैं वो पिसर हूँ जो समझा नहीं कि माँ क्या है<br />
मुझे खिलाइयों और दाइयों ने पाला था<br />
वो मुझसे कहती थीं जब घिर के आती थी बरसात<br />
जब आसमान में हरसू(चारों तरफ) घटाएँ छाती थीं<br />
बवक्‍़ते-शाम जब उड़ते थे हर तरफ़ जुगनू<br />
दिये दिखाते हैं ये भूली भटकी रूहों को!<br />
मजा़ भी आता था मुझको कुछ उनकी बातों में<br />
मैं उनकी बातों में रह-रह के खो भी जाता था<br />
पर उनकी बातों में रह-रह के दिल में कसक-सी होती थी<br />
कभी-कभी ये कसक हूक बन के उठती थी</p>
<p>यतीम दिल को मेरे ये ख़याल होता था<br />
ये शाम मुझको बना देती काश! इक जुगनू<br />
तो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राह<br />
कहाँ-कहाँ वो बिचारी भटक रही होगी!<br />
ये सोच कर मेरी हालत अजीब हो जाती<br />
पलक की ओट से जुगनू चमकने लगते थे<br />
कभी-कभी तो मेरी हिचकियाँ -सी बँध जातीं<br />
कि माँ के पास किसी तरह मैं पहुँच जाऊँ<br />
और उसको राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँ<br />
दिखाऊँ अपने खिलौने दिखाऊँ अपनी किताब<br />
कहूँ कि पढ़ के सुना तू मेरी किताब मुझे<br />
फिर उसके बाद दिखाऊँ उसे मैं वो कापी<br />
कि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिसमें<br />
ये हर्फ़ थे जिन्हें लिक्खा था मैंने पहले-पहल<br />
दिखाऊँ फिर उसे आँगन में वो गुलाब की बेल<br />
सुना है जिसको उसी ने कभी लगाया था<br />
ये जब की बात है जब मेरी उम्र ही क्या थी<br />
नज़र से गुज़री थीं कुल चार-पाँच बरसातें!</p>
<p>गुज़र रहे थे महो-साल और मौसम पर<br />
हमारे शहर में आती थी घिर के जब बरसात<br />
जब आसमान में उड़ते थे हर तरफ़ जुगनू<br />
हवा की मौ-रवाँ पर दिये जलाये हुये<br />
फ़जा में रात गये जब दरख्त पीपल का<br />
हज़ारों जुगनुओं से कोहे-तूर(रोशनी का पहाड़) बनता था<br />
हजारों वादी-ए-ऐमन थीं जिसकी शाखों में<br />
ये देखकर मेरे दिल में ये हूक उठती थी<br />
कि मैं भी होता इन्हीं जुगनुओं में इक जुगनू<br />
तो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राह<br />
वो माँ ,मैं जिसकी महब्बत के फूल चुन न सका<br />
वो माँ,मैं जिसकी महब्बत के बोल सुन न सका<br />
वो माँ,कि भींच के जिसको कभी मैं सो न सका<br />
मैं जिसके आँचलों में मुँह छिपा के रो न सका<br />
वो माँ,कि सीने में जिसके कभी चिमट न सका<br />
हुमक के गोद में जिसकी कभी मैं चढ़ न सका<br />
मैं जेरे-साया-ए-उम्मीद(आशा की छाया में) बढ़ न सका<br />
वो माँ,मैं जिससे शरारत की दाद पा न सका<br />
मैं जिसके हाथों महब्बत की मार खा न सका<br />
सँवारा जिसने न मेरे झंडूले बालों को<br />
बसा सकी न जो होंठों से मेरे गालों को<br />
जो मेरी आँखों में आँखें कभी न डाल सकी<br />
न अपने हाथों से मुझको कभी उछाल सकी<br />
वो माँ,जो कोई कहानी मुझे सुना न सकी<br />
मुझे सुलाने को जो लोरियाँ भी गा न सकी<br />
वो माँ,जो दूध भी अपना मुझे पिला न सकी<br />
वो माँ,जो अपने हाथ से मुझे खिला न सकी<br />
वो माँ, गले से जो अपने मुझे लगा न सकी<br />
वो माँ ,जो देखते ही मुझको मुस्करा न सकी<br />
कभी जो मुझसे मिठाई छिपा के रख न सकी<br />
कभी जो मुझसे दही भी बचा के रख न सकी<br />
मैं जिसके हाथ में कुछ देखकर डहक न सका<br />
पटक-पटक के कभी पाँव मैं ठुनक न सका<br />
कभी न खींचा शरारत से जिसका आँचल भी<br />
रचा सकी न मेरी आँखों में जो काजल भी<br />
वो माँ,जो मेरे लिए तितलियाँ पकड़ न सकी<br />
जो भागते हुए बाजू मेरे जकड़ न सकी<br />
बढा़या प्यार कभी करके प्यार में न कमी<br />
जो मुँह बना के किसी दिन न मुझसे रूठ सकी<br />
जो ये भी कह न सकी-जा न बोलूँगी तुझसे!<br />
जो एक बार ख़फा़ भी न हो सकी मुझसे<br />
वो जिसको जूठा लगा मुँह कभी दिखा न सका<br />
कसाफ़तों(गन्दगी) प मेरी जिसको प्यार आ न सका<br />
जो मिट्टी खाने प मुझको कभी न पीट सकी<br />
न हाथ थाम के मुझको कभी घसीट सकी<br />
वो माँ जो गुफ्तगू की रौ में सुन के मेरी बड़<br />
कभी जो प्यार से मुझको न कह सकी घामड़!<br />
शरारतों से मेरी जो कभी उलझ न सकी<br />
हिमाक़तों का मेरी फ़लस़फ़ा(दर्शन) समझ न सकी<br />
वो माँ जिसे कभी चौंकाने को मैं लुक न सका<br />
मैं राह छेंकने को जिसके आगे रुक न सका<br />
जो अपने हाथ से वह रूप मेरा भर न सकी<br />
जो अपनी आँखों को आईना मेरा कर न सकी<br />
गले में डाली न बाहों की पुष्पमाला भी<br />
न दिल में लौहे-जबीं(ललाट) से किया उजाला भी<br />
वो माँ,कभी जो मुझे बद्धियाँ पिन्हा न सकी<br />
कभी मुझे नये कपडों से जो सजा न सकीं<br />
वो माँ ,न जिससे लड़कपन के झूठ बोल सका<br />
न जिसके दिल के दर इन कुंजियों से खोल सका<br />
वो माँ मैं पैसे भी जिसके कभी चुरा न सका<br />
सजा़ से बचने को झूठी कसम भी खा न सका<br />
वो माँ कि ‘हाँ’ से भी होती है बढ़के जिसकी ‘नहीं’<br />
दमे- इताब जो बनती फ़रिश्ता रहमत का<br />
जो राग छेड़ती झुँझला के भी महब्बत का<br />
वो माँ,कि घुड़कियाँ भी जिसकी गीत बन जायें<br />
वो माँ,कि झिड़कियाँ भी जिसकी फूल बरसायें<br />
वो माँ,हम उससे जो दम भर को दुश्मनी कर लें<br />
तो ये न कह सके-अब आओ दोस्ती कर लें !<br />
कभी जो सुन न सकी मेरी तूतली बातें<br />
जो दे न सकी कभी थप्पडों की सौगा़तें<br />
वो माँ,बहुत से खिलौने जो मुझको दे न सकी<br />
ख़िराजे़-सरखु़शी-ए-सरमदी (हमेशा रहने वाली मस्ती का लगाव)जो ले न सकी<br />
वो माँ,लड़ाई न जिससे कभी मैं ठान सका<br />
वो माँ,मैं जिस प कभी मुठ्ठियाँ न तान सका<br />
वो मेरी माँ, कभी मैं जिसकी पीठ पर न चढ़ा<br />
वो मेरी माँ,कभी कुछ जिसके कान में न कहा<br />
वो माँ, कभी जो मुझे करधनी पिन्हा न सकी<br />
जो ताल हाथ से देकर मुझे नचा न सकी<br />
जो मेरे हाथ से इक दिन दवा भी पी न सकी<br />
कि मुझको जिन्दगी देने में जान ही दे दी<br />
वो माँ,न देख सका जिन्दगी में जिसकी चाह<br />
उसी की भटकी हुई रूह को दिखाता राह!</p>
<p>ये सोच-सोच के आँखें मेरी भर आती थीं<br />
तो जा के सूने बिछौने प लेट रहता था<br />
किसी से घर में न राज अपने दिल के कहता था<br />
यतीम थी मेरी दुनिया यतीम मेरी हयात<br />
यतीम शामों-सहर थी यतीम थे शबो-रोज़<br />
यतीम मेरी पढ़ाई थी मेरे खेल यतीम<br />
यतीम मेरी मसर्रत थी मेरा गम़ भी यतीम<br />
यतीम आँसुओं से तकिया भीग जाता था<br />
किसी से घर में न कहता था अपने दिल के भेद<br />
हर-इक से दूर अकेला उदास रहता था<br />
किसी शमायले-नादीदा(अनदेखी आकृति) को मैं ताका करता था<br />
मैं एक वहसते-बेनाम से हुड़कता था</p>
<p>गुज़र रहे थे महो-साल और मौसम पर<br />
इसी तरह कई बरसात आयीं और गयीं<br />
मैं रफ्‍़ता-रफ्‍़ता पहुँचने लगा बसिन्ने-शऊर<br />
तो जुगनुओं की हकीकत समझ में आने लगी<br />
अब उन खिलाइयों और दाइयों की बातों पर<br />
मेरा यक़ीं न रहा मुझ प हो गया ज़ाहिर<br />
कि भटकी रूहों को जुगनू नहीं दिखाते चराग़<br />
वो मन-गढ़ंत-सी कहानी थी इक फ़साना था<br />
वो बेपढ़ी-लिखी कुछ औरतों की थी बकवास<br />
भटकती रूहों को जुगनू नहीं दिखाते चराग़<br />
ये खुल गया -मेरे बहलाने को थी सारी बातें<br />
मेरा यकीं न रहा इन फ़ुजू़ल किस्सों पर–</p>
<p>हमारे शह्‌र में आती हैं अब भी बरसातें<br />
हमारे शह्‌र प अब भी घटाएँ छाती हैं<br />
हनोज़ भीगी हुई सुरमई फ़जाओं में<br />
खु़तूते-नूर(रोशनी की लकीरें) बनाती हैं जुगनुओं की सफें<br />
फ़जा-ए-तीराँ(अँधेरा वातावरण) में उड़ती हुई ये कन्दीलें<br />
मगर मैं जान चुका हूँ इसे बड़ा होकर<br />
किसी की रूह को जुगनू नहीं दिखाते राह<br />
कहा गया था जो बचपन में मुझसे झूठ था सब!<br />
मगर कभी-कभी हसरत से दिल में कहता हूँ<br />
ये जानते हुए,जुगनू नहीं दिखाते चराग!<br />
किसी की भटकी हुई रूह को -मगर फिर भी<br />
वो झूठ ही सही कितना हसीन झूठ था वो<br />
जो मुझसे छीन लिया उम्र के तका़जे़ ने<br />
मैं क्या बताऊँ वो कितनी हसीन दुनिया थी<br />
जो बढ़ती उम्र के हाथों ने छीन ली मुझसे<br />
समझ सके कोई ऐ काश! अह्‌दे-तिफ़ली(बाल्यकाल) को<br />
जहान देखना मिट्टी के एक रेजे को<br />
नुमूदे-लाला-ए-ख़ुदरौ (फूलों का बढ़ना-फैलना)में देखना जन्नत<br />
करे नज़ारा-ए-कौनेन(विश्व दर्शन) इक घिरौंदे में<br />
उठा के रख ले ख़ुदाई को जो हथेली पर<br />
करे दवाम को जो कैद एक लमहे में<br />
सुना? वो का़दिरे-मुतलक़(ईश्वर) है एक नन्हीं सी जान<br />
खु़दा भी सजदे में झुक जाये सामने उसके<br />
ये अक्‍़लो-फ़ह्‌म (बुद्दि-ज्ञान) बड़ी चीज है मुझे तसलीम(स्वीकार)<br />
मगर लगा नहीं सकते हम इसका अन्दाजा़<br />
कि आदमी को ये पड़ती है किस क़दर महँगी<br />
इक-एक कर के वो तिफ़ली(बालपन) के हर ख़याल की मौत<br />
बुलूगे-सिन में सदमें नये ख़यालों के<br />
नये ख़याल का धक्का नये ख़यालों की टीस<br />
नये तसव्वुरों का कर्ब़(यातना),अलअमाँ(खुदा पनाह दे) ,कि हयात<br />
तमाम ज़ख्‍़मे-निहाँ(छिपा घाव) हैं तमाम नशतर हैं<br />
ये चोट खा के सँभलना मुहाल होता है<br />
सुकून रात का जिस वक्‍़त छेड़ता है सितार<br />
कभी-कभी तेरी पायल से आती है झंकार<br />
तो मेरी आँखों से आँसू बरसने लगते हैं<br />
मैं जुगनू बन के तो तुम तक पहुँच नहीं सकता<br />
जो तुमसे हो सके ऐ माँ! वो तरीका बता<br />
तू जिसको पाले वो काग़ज़ उछाल दूँ कैसे<br />
ये नज्‍़म मैं तेरे कदमों में डाल दूँ कैसे</p>
<p>नवाँ-ए- दर्द(दर्द की आवाज) से कुछ जी तो हो गया हलका<br />
मगर जब आती है बरसात क्या करूँ इसको<br />
जब आसमान प उड़ते हैं हर तरफ़ जुगनू<br />
शराबे-नूर लिये सब्ज़ आबगीनों(प्यालों) में<br />
कँवल ज़लाते हुये जु़लमतों के सीनों में<br />
जब उनकी ताबिशे-बेसाख्‍़ता से पीपल का<br />
दरख्‍़त सरवे-चरागाँ को मात करता है<br />
न जाने किस लिए आँखें मेरी भर आती हैं!</p>
<p>-फ़िराक़ गोरखपुरी</p></blockquote>
<p><strong>संदर्भ-</strong> १.फ़िराक़ गोरखपुरी -ब़ज्‍़मे ज़िन्दगी: रंगे शायरी<br />
२.फ़िराक़ वार्ता-विश्वनाथ त्रिपाठी- तद्‌भव -अंक ७ अप्रैल,२००२</p>
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		<title>कैसे बताऊँ मैं तुम्हें&#8230;&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 13 Mar 2007 19:24:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रजनीश त्रिपाठी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[कैसे बताऊँ मैं तुम्हें….
मेरे लिये तुम कौन हो……
कैसे बताऊँ !!!
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
तुम धड्कनॊं का गीत हो,
जीवन का संगीत हो!
तुम जिन्दगी, तुम बन्दगी !
तुम रोशनी, तुम ताजगी!
तुम हर खुशी, तुम प्यार हो !
तुम प्रीत हो, मनमीत हो !
आँखों में तुम, यादों में तुम !
साँसों में तुम, आहों में तुम !
नींदों में तुम, ख्वाबों में तुम [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=trajaneesh.wordpress.com&blog=849923&post=5&subd=trajaneesh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>कैसे बताऊँ मैं तुम्हें….<br />
मेरे लिये तुम कौन हो……<br />
कैसे बताऊँ !!!<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें<br />
तुम धड्कनॊं का गीत हो,<br />
जीवन का संगीत हो!<br />
तुम जिन्दगी, तुम बन्दगी !<br />
तुम रोशनी, तुम ताजगी!<br />
तुम हर खुशी, तुम प्यार हो !<br />
तुम प्रीत हो, मनमीत हो !<br />
आँखों में तुम, यादों में तुम !<br />
साँसों में तुम, आहों में तुम !<br />
नींदों में तुम, ख्वाबों में तुम !<br />
तुम हो मेरी हर बात में…<br />
तुम हो मेरे दिन रात में !<br />
तुम सुबह में तुम शाम में !<br />
तुम सोच में तुम काम में !<br />
मेरे लिये पाना भी तुम !<br />
मेरे लिये खोना भी तुम !<br />
मेरे लिये हँसना भी तुम !<br />
मेरे लिये रोना भी तुम !……… और जागना सोना भी तुम !!!<br />
जाऊँ कहीं देखूँ कहीं…<br />
तुम हो वहाँ…तुम हो वहीं !<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें…….. तुम बिन तो मैं कुछ भी नहीं !!!<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें….मेरे लिये तुम कौन हो !!!<br />
ये जो तुम्हारा रूप है…ये जिन्दगी की धूप है !<br />
चन्दन से तरसा है ये बदन …बहती है ईसमें एक अगन !<br />
ये शोखियाँ ये मस्तियाँ ….   तुमको हवाओं से मिली !<br />
जुल्फ़ें घटाओं से मिली !<br />
होठों में कलियाँ खिल गयीं….. आखों को झीलें मिल गयीं !<br />
चेहरे में सिमटी चाँदनी….. आवाज में है रागिनी !<br />
शीशे के जैसा अंग है…फ़ूलों के जैसा रंग है !<br />
नदियों के जैसी चाल है… क्या हुस्न है ..क्या हाल है !!!<br />
ये जिस्म की रंगीनियाँ…… जैसे हजारों तितलियाँ !<br />
बाहों की ये गोलाईयाँ…. आँचल में ये परछाईयाँ !!!<br />
ये नगरियाँ हैं ख्वाब की…..कैसे बताऊँ मैं तुम्हें..हालत दिल &#8211; ऎ &#8211; बेताब की !!!<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें….मेरे लिये तुम कौन हो !!!<br />
कैसे बताऊँ….कैसे बताऊँ….<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें….मेरे लिये तुम धरम हो !!!<br />
मेरे लिये ईमान हो !<br />
तुम ही ईबादत हो मेरी…… तुम ही तो चाहत हो मेरी !<br />
तुम ही अरमान हो मेरा !<br />
तकता हूँ मैं हर पल जिसे.. वही तो तस्वीर हो तुम.<br />
तुम ही मेरी तकदीर हो.<br />
तुम ही सितारा हो मेरा…. तुम ही नजारा हो मेरा.<br />
यूँ ध्यान में मेरे हो तुम..जैसे मुझे घेरे हो तुम.<br />
पूरब में तुम, पश्चिम में तुम!!!….उत्तर में तुम, दक्षिण में तुम !!!<br />
सारे मेरे जीवन में तुम.<br />
हर पल में तुम…हर छिन में तुम !!!<br />
मेरे लिये रस्ता भी तुम…. मेरे लिये मन्जिल भी तुम.<br />
मेरे लिये सागर भी तुम..मेरे लिये साहिल भी तुम.<br />
मैं देखता बस तुमको हूँ….मैं सोचता बस तुमको हूँ.<br />
मैं जानता बस तुमको हूँ… मैं मानता बस तुमको हूँ.<br />
तुम ही मेरी पहचान हो…!!!<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें…. देवी हो तुम मेरे लिये.<br />
मेरे लिये भगवान हो !!!<br />
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें….मेरे लिये तुम कौन हो !!!<br />
कैसे……….. ????</p>
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